‘Bearing Witness’ – A WSS Book on Sexual Violence in South Chhattisgarh

wss-book-release_16thfebThis book is a comprehensive compilation of the incidents of sexual violence in South Chhattisgarh, drawing on independent investigations or joint fact findings by WSS.

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Title – Bearing Witness
Language – English
No. of pages – 128
Cost – Rs100/- + Rs40/- postal charges if required.
Bulk orders accepted. Postal charges will be confirmed according to the quantity ordered.

 

Grand Rally at College Square, Kolkata to Demand Release of Sharmistha Chowdhury And All Other Prisoners Of Bhangar Movement

WSS Condemns Threats by Bajrang Dal on WSS Activist in Assam

Women against Sexual Violence and State Repression (WSS) strongly condemns the manner in which our member Ms Bondita Acharya, a well known women’s activist from Jorhat, Assam, is being criminally intimidated, abused in sexual language, defamed and trolled on her Facebook account only because she expressed her personal opinion regarding eating of beef, a common practice in her state of Assam, and opposed targeting of Muslims for the same. She is being threatened with acid attack, rape and gang rape and issued death threats. It is clear that the persons making these threats are associated with hindutva organisations and the Bajrang Dal has even issued a press release demanding a public apology. We demand that the complaint she has lodged with the Superintendent of Police (CID) be immediately registered and strong action be taken against the perpetrators of threats. Since Ms Bondita Acharya is also the North East Coordinator of Human Rights Defenders Alert and a member of Women In Governance, the inactivity of the administration in this regard is even more serious.

The background of the incident is that 3 Muslim persons including a minor were arrested on the outskirts of Jorhat town on 7th April 2017 while returning home with half a kg of beef. It is claimed that they were cooking the same in a temporary hut at a construction site where they were working. The arrest has been made under The Assam Cattle Preservation Act of 1950, which does not criminalize possession or consumption of beef but only lays down the circumstances under which cattle may be permitted to be slaughtered. The FIR had been lodged by an active BJP supporter Mridu Pawan Bora. Many people were critical of this arrest on the social media since the consumption of beef is common in the North East and not confined to only the Muslim community. While participating in the conversation, Ms Bondita Acharya also commented that people even from higher castes of Hindus consumed beef. Upon this there was a systematic and targeted barrage of extremely vicious, sexually laden and defamatory posts on social media regarding Ms Bondita Acharya threatening her with rape, murder, acid attack, public beating etc. It is pertinent that the Muslim community is already a target in Assam on account of criminalizing Muslim refugees from Bangladesh even while an exercise to grant citizenship to Hindu refugees is going on. WSS expresses serious concern at the deliberate efforts to communalise society by the Hindutva organisations and the newly elected BJP government and the consequences this will have upon the freedom and security of women of all communities.

Sudha Bhardwaj, Kalpana Mehta, Bittu, Rinchin, Kalyani Menon, Nisha Biswas and Ranjana Padhi
On Behalf of WSS

WSS Statement on Recent Blasts in Sukma

WSS Statement on Recent Blasts in Sukma 
 
14.3.2017
 

WSS condemns the IED blast in Sukma on 11.3.2017 in which 12 CRPF personnel lost their lives and several others, including members of a road-construction crew, were injured. We express our condolences to the families of the deceased.

We are concerned that this incident will further fuel the cycle of pointless violence in which the entire Adivasi community is made to pay the price for the violent acts of others. Our experience shows that such attacks are followed by violent reprisals against the community in surrounding villages, through random arrests, forced “surrenders” and illegal detentions. Such responses, and the rhetoric of “revenge for the blood of martyrs” that is used to justify them, only deepens the alienation and exclusion of Adivasi villagers.

We hope that the state government will continue with efforts to restore the rule of law and regain public confidence, signaled by the shake-up in the police and administration in Bastar. But this is only a first step – the situation on the ground continues largely unchanged. We have a long way to go in combating the mindset that labels all Adivasis and human rights defenders and journalists questioning state violence as “Maoist supporters”, thereby legitimizing the harassment and violation to which they are subjected.

We reiterate our stand that militarization is not the answer to the present situation. The lives of combatants on both sides, and uncounted adivasi villagers continue to be lost in this war. Nothing can justify the bloodshed and loss of human lives and the destruction of the land and forests where this war is being fought.

WSS (Women Against Sexual Violence and State Repression) is a non funded, nationwide network of women from diverse political and social movements comprising of women’s organizations, mass organizations, civil liberty organizations, student and youth organizations, mass movements and individuals. For more information, please see wssnet.org

WSS Hindi Press Release on Kashmiri Women’s Day of Resistance

कश्मीर हमारा पर कश्मीरी किसके? कश्मीरी महिलाओं के प्रतिरोध दिवस २३ फरवरी को एकजुटता की जरूरत

भारत के सेना प्रमुख जनरल रावत ने कश्मीर के नौजवानों को पिछले दिनों चेतावनी दी कि अगर वे किसी प्रकार से भी सेना के काम के रास्ते में आएंगे तो उन्हें भी राष्ट्र विरोधी मानकर उनके साथ सख्त कार्यवाही की जाएगी. पर इसमें तो कुछ भी नया नहीं है. कश्मीर पर हक़ जताने की भारत की मुहीम तो दशकों पुरानी है. वहां पर सेना और विभिन्न अर्धसैनिक दलों की भयंकर मौजूदगी भी उतनी ही पुरानी है. यही नहीं १९९० से सेना को यह अधिकार भी क़ानूनन रूप से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के तहत मिला हुआ है सेना और अर्ध सैनिक बल किसी भी घर या जगह की तलाशी ले सकते हैं, मात्र शक की बिना पर किसी पर गोली चला सकते हैं और किसी को भी बगैर वारंट के गिरफ्तार कर सकते हैं. इस क़ानून के तहत की गयी कार्यवाई जवाबदेही से पूरी तरह से मुक्त है. साथ ही अगर सेना कोई ज्यादती करती है तो भी उसपर मुक़दमा चलाने से पहले सरकारी आज्ञा लेना पड़ती है.सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी बताती है कि भले ही कितना ही गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन रहा हो सेना पर केस चलाने की इजाजत एक बार भी नहीं मिली है.

मानो कानूनी छूट मिलते ही सशस्त्र बालों ने उसका दुरुपयोग करना शुरू कर दिया. २३ फरवरी १९९१ क़ी रात को राजपुताना राइफल्स रेजिमेंट ने कुपवाड़ा जिले के कुनान और पोशपोरा नाम के दो गांवों में तांडव मचाया. वहाँ ये टुकड़ियां तलाशी और पूछताछ के लिए गयी थीं. आदमियों को पकड़ कर गांव से बाहर निकाला और उनके साथ हिंसा क़ी और उन्हें कठोर यातना भी दी. पर साथ ही गांव में घुसकर बच्चियों और हर उम्र क़ी औरतों के साथ बलात्कार भी किया.पत्रकारों, गांववालों और महिला संगठनों क़ी जद्दोजहद के बावजूद सेना के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई.

याद रखना होगा कि किसी भी हाल में कानून में किसी सैनिक को बलात्कार करने की कोई छूट नहीं मिली है. पर 1994 क़ी संयुक्त राष्ट्र संघ क़ी एक रिपोर्ट बताती है कि 1990-92 के बीच सुरक्षा बलों द्वारा ८८२ बलात्कार किये गए. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार १९९०९९ के बीच सुरक्षा बलों को १०३९ केसों में मानवाधिकार के उल्लंघन का दोषी पाया गया. वारदातें तो अवश्य ज्यादा रही होंगी.

२० सालों से भारतीय सेना कुंण पोशपोरा क़ी सच्चाई से मुंह मोड़ती रही. प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए भी गांववालों को संघर्ष करना पड़ा. प्रशासनिक असमर्थता दिखाते हुए जांच भी कई बार टाली गयी. और जब जांच हुई तो बड़ी अनिच्छा से. और ८० औरतों क़ी गवाही और संचार माध्यमों क़ी फौरी रिपोटों के बावजूद भी इसे जांच ने एक फर्जी मामला बता दिया. बी जी वर्गीज क़ी अध्यक्षता में जो जांच समिति बनी उसने इस मामले को व्यापक धोखा कह दिया.

अंततः कहानी २०१३ में बदली जब वहां क़ी अदालत ने यह मामला फिर से खुलवाया. २२ साल तक भुक्तभोगियों के जख्म हरे ही रहे. २३ फरवरी का दिन यादगार बन गया उस संघर्ष का जो एक पीढ़ी से औरतें करती रही हैं और अब जाकर कुछ पाने क़ी उम्मीद रख सकती हैं. यह दिन कश्मीरी औरतों के प्रतिरोध दिवस के रूप में मनाया जाता है.

कश्मीरियों के साथ इन २७ सालों में जो हुआ वह पूरे देश को शर्मसार करने के लिए काफी है. मात्र २०१६ में जन विरोध को इस तरह कुचला गया कि सुरक्षा बलों के हाथों १०० से अधिक लोग मारे गए और हजारों की तादाद में जख्मी हुए. इसी तरह से झूठी मुठभेड़ के खिलाफ २०१० में जन आंदोलन को कुचला गया था तब भी १०० से ज्यादा लोग मारे गए थे और हजारों घायल हुए थे. इसके पहले से वहां सेना इतने आदमियों को उठा चुकी है जो दशकों से गयब हैं कि वहां औरतों को संबोधित करने का एक नया नाम पैदा हो गया है आधी विधवा वे औरतें जो नहीं जानती कि उनके पति कहाँ हैं, जिन्दा कैद में हैं या मार दिए गए हैं. हज़ारों लोगों पर सेना का आक्रमण आतंकियों पर नहीं कश्मीरियों पर हमला है.

बलात्कार के मामले को रफादफा करने वाले श्री वर्गीस ने भी यह बात मानी कि कश्मीर में भारतीय सेना का व्यवहार एक कब्जेधारी सेना जैसा है जो कश्मीरियों को अपना दुश्मन मानती है और उन्हें घेरेबंदी में रखती है. कब्जाधारी सेना ने हर युद्ध में हारे हुए देश की औरतों का बलात्कार भी व्यापक पैमाने पर किया है और यही हकीकत कश्मीर की भी है. और आज भारत के सेना प्रमुख भी आम लोगों को देश विरोधी करार देकर उन्हें खुले आम धमकी दे रहे हैं.

सेना की मौजूदगी ने क्या हासिल किया वह कह पाना तो मुश्किल है पर वहां की आम जनता को इतना भड़का दिया कि वह अब खुले आम रावलजी की धमकी को धता बता रही है और दो दिन के भीतर ही उसने सुरक्षा बलों को बगैर कार्यवाही के लौटने पर मजबूर कर दिया.

शायद यह आतंरिक विरोध को दबाने का नया सैन्य तरीका हो पर यह स्पष्ट रूप से कश्मीर और कश्मीरियों को अलगअलग मानता है और कश्मीरियों की कीमत पर भौगोलिक प्रभुत्व चाहता है. पर सच्चाई तो यह है की कश्मीरियों के बिना कश्मीर की कोई अहमियत नहीं ऐसे तो बर्बरता से दुनिया का कोई भी हिस्सा जीता जा सकता है. पर अगर कश्मीर और कश्मीरी दोनों चाहिए तो जवाब सैन्यीकरण में नहीं मिलेगा.

एक ही मार्ग खुला है जो वहां के लोगों के हक्कों की लड़ाई में साथ देने का है. तो धमकियों से परे हट कर कश्मीरी औरतों के प्रतिरोध में शामिल होकर उनके लिए भी देश को निर्भया जैसी एकजुटता दिखानी होगी.

AUD & WSS event to Commemorate Kashmiri Women’s Day of Resistance

Ambedkar University, Delhi and Women Against Sexual Violence and State Repression invite you to observe and commemorate the Kashmiri Women’s Day of Resistance and the horrific mass sexual violence unleashed by the Indian Army against the villagers of Kunan and Poshpora, Kashmir.

Date and Time: 23rd of February, 2017 (twenty-six years after the incident) at 2:30 PM, Ambedkar University, Delhi (AUD), Kashmiri Gate Campus.

Jab Toot Girengi Zanjeerein

Commemorating Kashmiri Women’s Day of Resistance

On a cold February night in 1991, a group of soldiers and officers of the 4th Rajputana Rifles regiment of the Indian army entered two villages of Kunan and Poshpora in the remote district of Kupwara in Kashmir. The army claimed it was conducting ‘search and interrogation’ operations seeking out armed militants presumed to be hiding there. Instead, they pulled the men in the village out of their homes, subjected them to severe torture, including sexual assault and humiliation, and detained them all night. The women of the two villages were brutally gang-raped at gun-point; several women were sexually assaulted and stripped, and then left for dead in their own homes. The men were released in the morning and returned home to find the women raped and brutalized by the Indian army. Twenty-six years later, the memory of this mass rape, torture and humiliation by the men in uniform lingers in the valley. “Kunan Poshpora” and the day of the 23rd February has since become a symbol across Kashmir and beyond of women’s resistance to the militarization of this region by the State. Moreover, Kashmir was brought under the purview of the Armed Forces Special Powers Act (AFSPA) in 1990, after it had been in operation in several North Eastern States since 1958. Under this law, armed forces and other security forces in “disturbed areas” have the license to shoot to kill anyone on suspicion; make arrests without warrants; enter and search any home or establishment; detain and question anyone. Armed forces personnel and security forces have complete immunity for actions taken under this law, and their prosecution requires prior sanction of the government. RTI information has disclosed that Sanction for prosecution of armed forces even for egregious human rights violation has never been granted. Continue reading

WSS Statement on Sexual Violence and Police Impunity in Gadhchiroli District

Sexual Violence and Police Impunity in Gadchiroli District

Women Against Sexual Violence and State Repression (WSS)

The impunity with which police forces have been operating in south Gadchiroli has become a matter of grave concern. The mountain of Surjagad which has been leased to Lloyd’s Chemicals for mining will destroy the mountain which has religious and cultural significance to the highly marginalised Madia Gonds residing in the area. who have opposed the lease. Police repression on the tribals has been intensifying, with random picking up, illegal detention and inhuman beatings of tribals, Things really however, took an extremely murky turn on January 20th, 2017 when two tribal women of Gonwara Village of Bande Block of Chhattisgarh were picked up by C-60, Maharashtra police personnel near Todgatta village while they were on their way to Gadchiroli district. Continue reading