बलात्कारियों को राजकीय संरक्षण देना बंद करो!!!! (WSS Press Release)

बलात्कारियों को राजकीय संरक्षण देना बंद करो!!!!

हम हाल ही में देश में लगातार हो रही बालात्कार और यौन हिंसा की घट्नाओं की कड़ी निंदा करते हैं: जम्मू के कठुआ जिले की आठ साल की बच्ची, उ.प्र. के उन्नाव जिले की १५ साल की लड़की, सूरत, गुजरात में  ११ साल की लड़की, १५ साल की फरीदाबाद की लड़की, जिसकी लाश को भी नहीं बक्शा गया, पानीपत की ११ साल की लड़की, इन सभी घट्नाओं के खिलाफ हो रहे देशव्यापी आक्रोश के बावजूद हाल ही में हुई इंदौर की घटना, जिसमें एक चार महीने की बच्ची के साथ बलात्कार किया गया। हम आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश, 2018 के द्वारा यौन अपराध अधिनियम (2012) में लाये गए बदलाव की भी निंदा करते हैं जिसके जरिये सजाये मौत का प्रावधान किया गया है।

२१-२२ अप्रैल को इंदौर में यौन हिंसा और राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएं (डब्लू.एस.एस) की दो दिवसीय,आठवी राष्ट्रीय बैठक हुई, जिसमें तेलंगाना, कर्नाटका, दिल्ली, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और मध्य प्रदेश के सदस्यों ने भाग लिया। इस बैठक में डब्लू.एस.एस ने यह निष्कर्ष निकाला:

बलात्कार की बढती घटनाओं के खिलाफ देश व्यापी जन आक्रोश के बीच अपराधियों को मृत्युदंड देने की मांग उठी है, डब्लू.एस.एस मृत्युदंड के खिलाफ है।

गणतंत्र दिवस के एक दिन पहले 25 जनवरी को मध्य प्रदेश के आठ थानों की पुलिस ने धार जिले के भील समुदाय, पहले से ही अपराधी माने जाने वाले, के गाँव पर कथित रूप से उन लोगों के घर पर, जिनके खिलाफ पहले से ही वारंट है, बड़ी संख्या में छापा मारा। इन छापों के दौरान, चार महिलाओं का बलात्कार हुआ, जिनमें से एक गर्भवती थी और दो नाबालिग लड़कियों के साथ छेड़ छाड़ हुई। इन महिलाओं की आपबीती उतनी ही दहलाने वाली थी, जितनी की पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ के बस्तर में आदिवासी महिलाओं के अनुभव थे।  इस खनिज प्रधान दक्षिण छत्तीसगढ़ के इलाके में कॉर्पोरेट घरानों के लिए रास्ता साफ़ करने के लिए पुलिस एवं सशस्त्र बलों के
छापे मारी अभियान में पिछले तीन वर्षों में पचास से अधिक महिलाओं के साथ यौन हिंसा व् बलात्कार की घटनाएं सामने आई है।

उपरोक्त घट्नाओं की रौशनी में यह स्पष्ट होता है की यौन हिंसा में राज्य सत्ता के नुमाइंदे, दबंग जाति एवं धार्मिक समूह द्वारा यौन हिंसा को अंजाम दिया जाना देखा है। जिससे साफ़ जाहिर होता है कि आपराधिक कानून संशोधन अध्याधेश (२०१८) महज एक छलावा है।  राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो २०१६ के आंकड़ों के अनुसार धारा 376 एवं बाल यौन अपराध संरक्षण कानून, २०१२ (pocso) के केसों में 94.6% बलात्कारी पीडिता की जान पहचान का होना पाया गया था- वो या तो करीबी रिश्तेदार, पडोसी, या परिचित था। ऐसी स्थिति में, पीडिता के लिए शिकायत दर्ज कराना बेहद मुश्किल हो जाता है, खासकर जब वह नाबालिग हो। नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बैंगलोर द्वारा जारी एक रिपोर्ट में, यह पाया गया कि वर्ष 2013 और 2015 के बीच पोक्सो के तहत दर्ज 667 केसों में , 67.5% पीडिता ने अपने बयान पलट दिए। पीडिता की चुप्पी या उस पर चुप रहने का दबाव, परिवार और समाज में पितृसत्तात्मक ढाँचे की गहरी पैठ का परिणाम है।

इसके पर्याप्त सबूत हैं कि सजाये मौत अपराधी पर लगाम लगाने में असफल रही है। उल्टे इसका असर, काफी हद तक, वास्तव में लोगों को अपराध की रिपोर्ट करने से रोकता है। इसके अलावा, विभिन्न अध्ययनों से निष्कर्ष निकले हैं कि मृत्युदंड मनमाने तरीके से दिया जाता है और लगभग सभी मामलों में, यह देखा गया है कि इसे केवल समाज के सबसे हाशिए के और उत्पीड़ित वर्गों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है। यही नहीं, महिला आन्दोलन और वकीलों ने इस बात के समर्थन में तर्क दिए हैं कि सजा गंभीर होने के फलस्वरूप अपराध भी गंभीर रूप धारण कर लेता है और बलात्कार के बाद पीडिता को मार डालने की संभावना बढ जाती है।

निर्भया मामले के फलस्वरूप, 2013 में स्थापित न्यायमूर्ति वर्मा समिति ने मृत्युदंड के खिलाफ मजबूत सिफारिशें की, जिसमें उन्होनें मृत्युदंड को “सजा और सुधार के क्षेत्र में एक प्रतिकूल कदम” कहा। इसके चलते, केंद्र द्वारा आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013 में मृत्युदंड को नहीं जोड़ा गया। यहां तक कि पोक्सो के संबंध में, समस्या वास्तव में  सज़ा न मिलने की है न की सज़ा के कड़े नहीं होने की। व्यापक विचार विमर्श के बगैर, इस अध्यादेश को देश पर थोप दिया गया है। यह अध्यादेश जारी करके, भाजपा सरकार ने जान बूझ कर अपने दल के अपराधी तत्वों और उनके समर्थकों से ध्यान हटाने की कोशिश की है। मृत्युदंड के आम जनसमर्थन, जिसे मीडिया बड़ाचढा कर दिखा रहा है, उसका तुष्टिकरण करके सरकार ने वाहवाही लूट ली। औरतों के प्रति निहायत ही खोखली सहानुभूति दिखाने वाली सरकार ने मृत्युदंड को उनके बचाव के लिए लागू करके अपनी मर्दानगी का उदाहरण प्रस्तुत किया है। वही, ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक 2016, के अंतर्गत बलात्कार की सज़ा सिर्फ २ साल तक सीमित की गयी है, जबकी महिलाओं से बलात्कार की घट्नाओं में सात वर्ष की सज़ा का प्रावधान है। क्या किन्नर देश के नागरिक नहीं?

यह विडम्बंना है कि जहाँ मध्य प्रदेश राज्य सरकार ने बलात्कार को बेलगाम बढने का अवसर दिया है और देश में बलात्कार की घट्नाओं में सर्वोच्च स्थान पर है, आज वाह वाही लूटने के लिए बच्चों के बलात्कारियों के लिए मृत्यु दंड की मांग करने में सबसे आगे है।

देश में व्यापक तौर पर हाशिए पर फेके गए कमजोर समुदायों के खिलाफ जो डर व् आतंक का माहौल  आज भाजपा के शासन में फैलाया जा रहा है वह संघ परिवार की विचारधारा का हिस्सा है, और उपरोक्त  घट्नाओं को इससे अलग करके नहीं देखा जा सकता। अनिवार्य रूप से, ऐसे माहौल में महिलाओं का शरीर युद्ध का मैदान बन जाता है जिस पर यह हिंसा खेली जाती है। चाहे धर्म के नाम पर कठुआ में बकरवाल- मुसलिम जनजाति को खदेड़ने के लिए हिन्दू राष्ट्रवादियों द्वारा बलात्कार को राजनैतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा हो, या फिर उन्नाव की तरह जहाँ आरोपी भाजपा का विधायक हो जिसे सत्ताधारी पार्टी का संरक्षण मिल रहा हो , इन सभी अपराधों में यह प्रतीत होता है कि सत्ताधारी दल की अपराधिक तत्वों से गहरी सांठ गाँठ है।

डब्लू.एस.एस. मांग करता है कि आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश 2018 को रद्द किया जाये। हम समाज के प्रगतिशील व्यक्तियों और समूहों का आह्वान करते हैं कि वे पीड़ितों के समर्थन में खड़े हों, ताकि कम से कम कानूनी प्रक्रियाओं का पालन हो और मौजूदा कानून प्रभावी बनाया जा सके।

इंदौर

23.04.2018

अजिता, शालिनी, रिनचिन, निशा

        राष्ट्रीय समंवयक, राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएं (डब्लू.एस.एस)

“यौन हिंसा व राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएं” (WSS) नवम्बर 2009 में गठित एक गैर-अनुदान प्राप्त जमीनी प्रयास है. इस अभियान का मकसद है- हमारे शारीर व हमारे समाज पर हो रही हिंसा को ख़त्म करना. हमारा नेटवर्क पुरे देश में फैला हुआ है और इसमें शामिल हम औरतें अनेक राजनीतिक परिपाटियों, जन संगठनों, छात्र व युवा संगठनों, नागरिक अधिकार संगठनों एवं व्यक्तिगत स्तर पर हिंसा व दमन के खिलाफ सक्रीय हैं. हम औरतों व लड़कियों के विरुद्ध किसी भी अपराधी/अपराधियों द्वारा की जा रही यौन हिंसा व राजकीय दमन के खिलाफ हैं.

संपर्क                                                                                                                                                                                                                                                                                  www.wssnet.org                                                                                                                                                       againstsexualviolence@gmail.com

 

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