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बलात्कारियों को राजकीय संरक्षण देना बंद करो!!!! (WSS Press Release)

बलात्कारियों को राजकीय संरक्षण देना बंद करो!!!!

हम हाल ही में देश में लगातार हो रही बालात्कार और यौन हिंसा की घट्नाओं की कड़ी निंदा करते हैं: जम्मू के कठुआ जिले की आठ साल की बच्ची, उ.प्र. के उन्नाव जिले की १५ साल की लड़की, सूरत, गुजरात में  ११ साल की लड़की, १५ साल की फरीदाबाद की लड़की, जिसकी लाश को भी नहीं बक्शा गया, पानीपत की ११ साल की लड़की, इन सभी घट्नाओं के खिलाफ हो रहे देशव्यापी आक्रोश के बावजूद हाल ही में हुई इंदौर की घटना, जिसमें एक चार महीने की बच्ची के साथ बलात्कार किया गया। हम आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश, 2018 के द्वारा यौन अपराध अधिनियम (2012) में लाये गए बदलाव की भी निंदा करते हैं जिसके जरिये सजाये मौत का प्रावधान किया गया है।

२१-२२ अप्रैल को इंदौर में यौन हिंसा और राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएं (डब्लू.एस.एस) की दो दिवसीय,आठवी राष्ट्रीय बैठक हुई, जिसमें तेलंगाना, कर्नाटका, दिल्ली, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और मध्य प्रदेश के सदस्यों ने भाग लिया। इस बैठक में डब्लू.एस.एस ने यह निष्कर्ष निकाला:

बलात्कार की बढती घटनाओं के खिलाफ देश व्यापी जन आक्रोश के बीच अपराधियों को मृत्युदंड देने की मांग उठी है, डब्लू.एस.एस मृत्युदंड के खिलाफ है।

गणतंत्र दिवस के एक दिन पहले 25 जनवरी को मध्य प्रदेश के आठ थानों की पुलिस ने धार जिले के भील समुदाय, पहले से ही अपराधी माने जाने वाले, के गाँव पर कथित रूप से उन लोगों के घर पर, जिनके खिलाफ पहले से ही वारंट है, बड़ी संख्या में छापा मारा। इन छापों के दौरान, चार महिलाओं का बलात्कार हुआ, जिनमें से एक गर्भवती थी और दो नाबालिग लड़कियों के साथ छेड़ छाड़ हुई। इन महिलाओं की आपबीती उतनी ही दहलाने वाली थी, जितनी की पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ के बस्तर में आदिवासी महिलाओं के अनुभव थे।  इस खनिज प्रधान दक्षिण छत्तीसगढ़ के इलाके में कॉर्पोरेट घरानों के लिए रास्ता साफ़ करने के लिए पुलिस एवं सशस्त्र बलों के
छापे मारी अभियान में पिछले तीन वर्षों में पचास से अधिक महिलाओं के साथ यौन हिंसा व् बलात्कार की घटनाएं सामने आई है।

उपरोक्त घट्नाओं की रौशनी में यह स्पष्ट होता है की यौन हिंसा में राज्य सत्ता के नुमाइंदे, दबंग जाति एवं धार्मिक समूह द्वारा यौन हिंसा को अंजाम दिया जाना देखा है। जिससे साफ़ जाहिर होता है कि आपराधिक कानून संशोधन अध्याधेश (२०१८) महज एक छलावा है।  राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो २०१६ के आंकड़ों के अनुसार धारा 376 एवं बाल यौन अपराध संरक्षण कानून, २०१२ (pocso) के केसों में 94.6% बलात्कारी पीडिता की जान पहचान का होना पाया गया था- वो या तो करीबी रिश्तेदार, पडोसी, या परिचित था। ऐसी स्थिति में, पीडिता के लिए शिकायत दर्ज कराना बेहद मुश्किल हो जाता है, खासकर जब वह नाबालिग हो। नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बैंगलोर द्वारा जारी एक रिपोर्ट में, यह पाया गया कि वर्ष 2013 और 2015 के बीच पोक्सो के तहत दर्ज 667 केसों में , 67.5% पीडिता ने अपने बयान पलट दिए। पीडिता की चुप्पी या उस पर चुप रहने का दबाव, परिवार और समाज में पितृसत्तात्मक ढाँचे की गहरी पैठ का परिणाम है।

इसके पर्याप्त सबूत हैं कि सजाये मौत अपराधी पर लगाम लगाने में असफल रही है। उल्टे इसका असर, काफी हद तक, वास्तव में लोगों को अपराध की रिपोर्ट करने से रोकता है। इसके अलावा, विभिन्न अध्ययनों से निष्कर्ष निकले हैं कि मृत्युदंड मनमाने तरीके से दिया जाता है और लगभग सभी मामलों में, यह देखा गया है कि इसे केवल समाज के सबसे हाशिए के और उत्पीड़ित वर्गों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है। यही नहीं, महिला आन्दोलन और वकीलों ने इस बात के समर्थन में तर्क दिए हैं कि सजा गंभीर होने के फलस्वरूप अपराध भी गंभीर रूप धारण कर लेता है और बलात्कार के बाद पीडिता को मार डालने की संभावना बढ जाती है।

निर्भया मामले के फलस्वरूप, 2013 में स्थापित न्यायमूर्ति वर्मा समिति ने मृत्युदंड के खिलाफ मजबूत सिफारिशें की, जिसमें उन्होनें मृत्युदंड को “सजा और सुधार के क्षेत्र में एक प्रतिकूल कदम” कहा। इसके चलते, केंद्र द्वारा आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013 में मृत्युदंड को नहीं जोड़ा गया। यहां तक कि पोक्सो के संबंध में, समस्या वास्तव में  सज़ा न मिलने की है न की सज़ा के कड़े नहीं होने की। व्यापक विचार विमर्श के बगैर, इस अध्यादेश को देश पर थोप दिया गया है। यह अध्यादेश जारी करके, भाजपा सरकार ने जान बूझ कर अपने दल के अपराधी तत्वों और उनके समर्थकों से ध्यान हटाने की कोशिश की है। मृत्युदंड के आम जनसमर्थन, जिसे मीडिया बड़ाचढा कर दिखा रहा है, उसका तुष्टिकरण करके सरकार ने वाहवाही लूट ली। औरतों के प्रति निहायत ही खोखली सहानुभूति दिखाने वाली सरकार ने मृत्युदंड को उनके बचाव के लिए लागू करके अपनी मर्दानगी का उदाहरण प्रस्तुत किया है। वही, ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक 2016, के अंतर्गत बलात्कार की सज़ा सिर्फ २ साल तक सीमित की गयी है, जबकी महिलाओं से बलात्कार की घट्नाओं में सात वर्ष की सज़ा का प्रावधान है। क्या किन्नर देश के नागरिक नहीं?

यह विडम्बंना है कि जहाँ मध्य प्रदेश राज्य सरकार ने बलात्कार को बेलगाम बढने का अवसर दिया है और देश में बलात्कार की घट्नाओं में सर्वोच्च स्थान पर है, आज वाह वाही लूटने के लिए बच्चों के बलात्कारियों के लिए मृत्यु दंड की मांग करने में सबसे आगे है।

देश में व्यापक तौर पर हाशिए पर फेके गए कमजोर समुदायों के खिलाफ जो डर व् आतंक का माहौल  आज भाजपा के शासन में फैलाया जा रहा है वह संघ परिवार की विचारधारा का हिस्सा है, और उपरोक्त  घट्नाओं को इससे अलग करके नहीं देखा जा सकता। अनिवार्य रूप से, ऐसे माहौल में महिलाओं का शरीर युद्ध का मैदान बन जाता है जिस पर यह हिंसा खेली जाती है। चाहे धर्म के नाम पर कठुआ में बकरवाल- मुसलिम जनजाति को खदेड़ने के लिए हिन्दू राष्ट्रवादियों द्वारा बलात्कार को राजनैतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा हो, या फिर उन्नाव की तरह जहाँ आरोपी भाजपा का विधायक हो जिसे सत्ताधारी पार्टी का संरक्षण मिल रहा हो , इन सभी अपराधों में यह प्रतीत होता है कि सत्ताधारी दल की अपराधिक तत्वों से गहरी सांठ गाँठ है।

डब्लू.एस.एस. मांग करता है कि आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश 2018 को रद्द किया जाये। हम समाज के प्रगतिशील व्यक्तियों और समूहों का आह्वान करते हैं कि वे पीड़ितों के समर्थन में खड़े हों, ताकि कम से कम कानूनी प्रक्रियाओं का पालन हो और मौजूदा कानून प्रभावी बनाया जा सके।

इंदौर

23.04.2018

अजिता, शालिनी, रिनचिन, निशा

        राष्ट्रीय समंवयक, राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएं (डब्लू.एस.एस)

“यौन हिंसा व राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएं” (WSS) नवम्बर 2009 में गठित एक गैर-अनुदान प्राप्त जमीनी प्रयास है. इस अभियान का मकसद है- हमारे शारीर व हमारे समाज पर हो रही हिंसा को ख़त्म करना. हमारा नेटवर्क पुरे देश में फैला हुआ है और इसमें शामिल हम औरतें अनेक राजनीतिक परिपाटियों, जन संगठनों, छात्र व युवा संगठनों, नागरिक अधिकार संगठनों एवं व्यक्तिगत स्तर पर हिंसा व दमन के खिलाफ सक्रीय हैं. हम औरतों व लड़कियों के विरुद्ध किसी भी अपराधी/अपराधियों द्वारा की जा रही यौन हिंसा व राजकीय दमन के खिलाफ हैं.

संपर्क                                                                                                                                                                                                                                                                                  www.wssnet.org                                                                                                                                                       againstsexualviolence@gmail.com

 

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End Political Impunity to Rapists (WSS Press Release)

We strongly condemn the recent incidents of rape and sexual violence in the country: the rape of an 8-year old girl in Kathua, Jammu, of a 15-year old in Unnao, UP, of a tea-shop owner as well as 15 year old girl in Meghalaya, of an 11-year old girl in Surat, Gujarat, a 15-year old in Faridabad whose corpse was continually raped, another 11-year old girl in Panipat and closer home and even more recently, the rape of a four-month old child of balloon-sellers in Indore, MP while there is an outrage against rape in the country. We also unequivocally condemn the Criminal Law (Amendment) Ordinance, 2018 which seeks to amend among other things the Protection of Children from Sexual Offences Act (2012) by sanctioning the death penalty in cases of rape of minor girls.

A two day national meeting of Women Against Sexual Violence and Sexual Repression (WSS)  was held in Indore on 21-22 of April, and attended by members from Telangana, Karnataka, Delhi, Chhattisgarh, Uttarakhand, Himachal Pradesh, Maharashtra, Orissa, Rajasthan and Madhya Pradesh, Women against Sexual Violence and State repression (WSS) concluded:

There has been an uproar about some of these incidents, and a wave of protests have swept across the country. Amidst this much-needed outrage against rape, there have also been calls for capital punishment for the perpetrators of these crimes. We, as WSS, do not in any way support the death penalty as a form of punishment.

On the 25th of January 2017, a day before Republic Day, police from eight thanas carried out a massive raid in Dhar, Madhya Pradesh with the intention to nab people with pending warrants against them – all of whom were members of the Bhil community, a tribe historically stigmatized as criminals. During this raid, four women were raped including one pregnant woman, and two minor girls were molested. The accounts of these women were chillingly similar to the testimonies of tribal women from Bastar, in the neighbouring state of Chhattisgarh. In the last three years over 50 women have been raped and sexually assaulted by members of the police and security forces in the mineral rich lands of south Chhattisgarh, as they “comb” the forests to make way for large corporations to begin mining.

In the light of the above incidents where the State machinery, dominant caste and religious groups is committing acts of sexual violence, it is clear that the Criminal Law (Amendment) Ordinance 2018 is a complete sham. It not only sanctions the death penalty for the rape of minor girls but also changes a gender-neutral act i.e. which applied to both boys and girls, to one that talks of only “women under the age of 12”. Moreover, according to the National Crimes Record Bureau (NCRB) data of 2016, in 94.6% of the cases under POCSO and Section 376, the perpetrator(s) turned out to be a known person – he was either a close family member, a neighbour, or an acquaintance. In such a situation, it is extremely difficult for the survivor to report the crime, particularly when the survivor is a minor. In a report released by National Law School of India University, Bangalore, it was found that of the 667 POCSO judgements between 2013 and 2015, 67.5% of the victims turned hostile. The fact that victims are either silenced or forced to remain silent is a result of the deeply entrenched patriarchal structures within the family and society.

There is sufficient evidence to show that capital punishment has never served to act as a deterrent to the committing of crimes. Quite contrarily, it in fact deters people from reporting the crime. Also, not only does research indicate that the awarding of the death penalty is largely arbitrary and in almost all cases so far, it has only been awarded to accused from the most marginalised and oppressed sections of society. In the particular case of rape, as several people from the women’s movement and lawyers have argued, the death penalty in fact further endangers the life of the survivor as the severity of the punishment then becomes an incentive to end the survivors life.

The Justice Verma Committee set up in 2013 in response to the Nirbhaya case made strong recommendations against the death penalty, calling it “a regressive step in the field of sentencing and reformation.” Despite that, the Centre chose to exclude this recommendation in the Criminal Law (Amendment) Act 2013. Even with regards to POCSO, the problem really is one of lack of conviction and not one of the severity of punishment meted out. Instead of working on effective implementation of the existing act, the BJP has hurriedly pushed forward the ordinance without consulting with people working on child rights and cases of child sexual abuse. By talking about death, the government has conveniently shifted attention from the legislators who have supported and perpetrated these crimes. Instead, by pandering to popular sentiment orchestrated by the media, they seek to gain political mileage from such heinous acts of violence. Masqueraded as concern about growing sexual violence against children, what the amendment actually does is perpetuate the hyper-masculine regime of the BJP – where justice in cases of sexual violence becomes an act of revenge in a sense, with the “honour” of India’s children and women being avenged by the tough manhood of the nation. At the same time, the Transgender Persons (Protection of Rights) Bill 2016 proposes a punishment of only 2 years in cases of rape against transgender persons, as opposed to the 7-year imprisonment in the case of rape against women. By bringing in such amendments in quick succession the state is seeking to undermine the citizenship rights of sexual minorities, once again cashing in on popular prejudices.

It is also ironic that Madhya Pradesh, the state which leads the country in the number of rapes, was the one to initiate the demand for the death penalty for child-rapists.

We do not see these as isolated incidents of violence, but as part of a larger reign of terror unleashed upon the most marginalised and vulnerable sections of our society. Inevitably then, it is the bodies of women that become the battlefields on which this violence is played out. Whether in the name of religion in the case of Kathua, where rape is used as a political weapon by Hindu nationalists to displace and dislodge Bakarwal, a marginalised Muslim tribal community, or in the case of Unnao, where the accused, who is a BJP MLA is protected with the impunity for belonging to the ruling party, in each of these incidents, we believe that the State is deeply complicit in these acts of extreme violence.

WSS demands the withdrawal of the sanction of the death penalty by the Criminal Law (Amendment) Ordinance 2018 and calls upon progressive individuals and groups in civil society to stand in support of victims and survivors ensuring that at the very least legal processes are followed and existing laws are implemented.

Indore

23.4.2018                                           

 Ajitha, Shalini, Rinchin, Nisha

               National Conveners, Women Against Sexual Violence and Sexual Repression (WSS), wssnet.org

Delhi Press Conference of Suneeta Pottam and Munni Pottam on Extra-Judicial Killings in Chhattisgarh: Press Release And Video

PRESS RELEASE

Two teenaged adivasi girls from Bastar take on the state in their fight against extra-judicial killings. A Public Interest Litigation challenging the spate of encounters in Bijapur was filed last year before the Chhattisgarh High Court in Bilaspur by two young women from Korcholi with extra-ordinary grit and determination –Suneeta Pottam (19 years old).and Munni Pottam (18 years old). A national women’s organization, the WSS (wssnet.org) is the third petitioner in this case. Faced with a dozen affidavits of the villagers whose family members were killed, the High Court of Bilaspur held that the questions of extra judicial executions and government policies which are responsible for these are similar in spirit to the issues raised by the Salwa Judum petition (Nandini Sundar and Ors vs. State of Chhattisgarh), currently being heard by the Supreme Court. Following which, the young Petitioners filed a Transfer Petition in the Supreme Court last year seeking the transfer of their PIL to the Supreme Court. Suneeta and Munni Pottam are in Delhi to attend the hearing of their transfer petition on Wednesday, 10 January 2018.

At the press conference these young women spoke about these cases of encounters along with the details of the very recent physical and sexual assault of the the women of the villages where Suneeta and Munni live. They also spoke about the harrassment and threats that they have been receiving by the Bastar police (as recent as few weeks back) as result of filing this petition, who have threatened them that if they keep raising these issues which show the police in a bad light, they would be arrested for Naxalite offences and thrown into jail. Shaken but not defeated, these young women have come to Delhi to put their continuous harassment on record before the apex court at the coming hearing. Continue reading

WSS Hindi Press Release on Kashmiri Women’s Day of Resistance

कश्मीर हमारा पर कश्मीरी किसके? कश्मीरी महिलाओं के प्रतिरोध दिवस २३ फरवरी को एकजुटता की जरूरत

भारत के सेना प्रमुख जनरल रावत ने कश्मीर के नौजवानों को पिछले दिनों चेतावनी दी कि अगर वे किसी प्रकार से भी सेना के काम के रास्ते में आएंगे तो उन्हें भी राष्ट्र विरोधी मानकर उनके साथ सख्त कार्यवाही की जाएगी. पर इसमें तो कुछ भी नया नहीं है. कश्मीर पर हक़ जताने की भारत की मुहीम तो दशकों पुरानी है. वहां पर सेना और विभिन्न अर्धसैनिक दलों की भयंकर मौजूदगी भी उतनी ही पुरानी है. यही नहीं १९९० से सेना को यह अधिकार भी क़ानूनन रूप से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के तहत मिला हुआ है सेना और अर्ध सैनिक बल किसी भी घर या जगह की तलाशी ले सकते हैं, मात्र शक की बिना पर किसी पर गोली चला सकते हैं और किसी को भी बगैर वारंट के गिरफ्तार कर सकते हैं. इस क़ानून के तहत की गयी कार्यवाई जवाबदेही से पूरी तरह से मुक्त है. साथ ही अगर सेना कोई ज्यादती करती है तो भी उसपर मुक़दमा चलाने से पहले सरकारी आज्ञा लेना पड़ती है.सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी बताती है कि भले ही कितना ही गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन रहा हो सेना पर केस चलाने की इजाजत एक बार भी नहीं मिली है.

मानो कानूनी छूट मिलते ही सशस्त्र बालों ने उसका दुरुपयोग करना शुरू कर दिया. २३ फरवरी १९९१ क़ी रात को राजपुताना राइफल्स रेजिमेंट ने कुपवाड़ा जिले के कुनान और पोशपोरा नाम के दो गांवों में तांडव मचाया. वहाँ ये टुकड़ियां तलाशी और पूछताछ के लिए गयी थीं. आदमियों को पकड़ कर गांव से बाहर निकाला और उनके साथ हिंसा क़ी और उन्हें कठोर यातना भी दी. पर साथ ही गांव में घुसकर बच्चियों और हर उम्र क़ी औरतों के साथ बलात्कार भी किया.पत्रकारों, गांववालों और महिला संगठनों क़ी जद्दोजहद के बावजूद सेना के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई.

याद रखना होगा कि किसी भी हाल में कानून में किसी सैनिक को बलात्कार करने की कोई छूट नहीं मिली है. पर 1994 क़ी संयुक्त राष्ट्र संघ क़ी एक रिपोर्ट बताती है कि 1990-92 के बीच सुरक्षा बलों द्वारा ८८२ बलात्कार किये गए. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार १९९०९९ के बीच सुरक्षा बलों को १०३९ केसों में मानवाधिकार के उल्लंघन का दोषी पाया गया. वारदातें तो अवश्य ज्यादा रही होंगी.

२० सालों से भारतीय सेना कुंण पोशपोरा क़ी सच्चाई से मुंह मोड़ती रही. प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए भी गांववालों को संघर्ष करना पड़ा. प्रशासनिक असमर्थता दिखाते हुए जांच भी कई बार टाली गयी. और जब जांच हुई तो बड़ी अनिच्छा से. और ८० औरतों क़ी गवाही और संचार माध्यमों क़ी फौरी रिपोटों के बावजूद भी इसे जांच ने एक फर्जी मामला बता दिया. बी जी वर्गीज क़ी अध्यक्षता में जो जांच समिति बनी उसने इस मामले को व्यापक धोखा कह दिया.

अंततः कहानी २०१३ में बदली जब वहां क़ी अदालत ने यह मामला फिर से खुलवाया. २२ साल तक भुक्तभोगियों के जख्म हरे ही रहे. २३ फरवरी का दिन यादगार बन गया उस संघर्ष का जो एक पीढ़ी से औरतें करती रही हैं और अब जाकर कुछ पाने क़ी उम्मीद रख सकती हैं. यह दिन कश्मीरी औरतों के प्रतिरोध दिवस के रूप में मनाया जाता है.

कश्मीरियों के साथ इन २७ सालों में जो हुआ वह पूरे देश को शर्मसार करने के लिए काफी है. मात्र २०१६ में जन विरोध को इस तरह कुचला गया कि सुरक्षा बलों के हाथों १०० से अधिक लोग मारे गए और हजारों की तादाद में जख्मी हुए. इसी तरह से झूठी मुठभेड़ के खिलाफ २०१० में जन आंदोलन को कुचला गया था तब भी १०० से ज्यादा लोग मारे गए थे और हजारों घायल हुए थे. इसके पहले से वहां सेना इतने आदमियों को उठा चुकी है जो दशकों से गयब हैं कि वहां औरतों को संबोधित करने का एक नया नाम पैदा हो गया है आधी विधवा वे औरतें जो नहीं जानती कि उनके पति कहाँ हैं, जिन्दा कैद में हैं या मार दिए गए हैं. हज़ारों लोगों पर सेना का आक्रमण आतंकियों पर नहीं कश्मीरियों पर हमला है.

बलात्कार के मामले को रफादफा करने वाले श्री वर्गीस ने भी यह बात मानी कि कश्मीर में भारतीय सेना का व्यवहार एक कब्जेधारी सेना जैसा है जो कश्मीरियों को अपना दुश्मन मानती है और उन्हें घेरेबंदी में रखती है. कब्जाधारी सेना ने हर युद्ध में हारे हुए देश की औरतों का बलात्कार भी व्यापक पैमाने पर किया है और यही हकीकत कश्मीर की भी है. और आज भारत के सेना प्रमुख भी आम लोगों को देश विरोधी करार देकर उन्हें खुले आम धमकी दे रहे हैं.

सेना की मौजूदगी ने क्या हासिल किया वह कह पाना तो मुश्किल है पर वहां की आम जनता को इतना भड़का दिया कि वह अब खुले आम रावलजी की धमकी को धता बता रही है और दो दिन के भीतर ही उसने सुरक्षा बलों को बगैर कार्यवाही के लौटने पर मजबूर कर दिया.

शायद यह आतंरिक विरोध को दबाने का नया सैन्य तरीका हो पर यह स्पष्ट रूप से कश्मीर और कश्मीरियों को अलगअलग मानता है और कश्मीरियों की कीमत पर भौगोलिक प्रभुत्व चाहता है. पर सच्चाई तो यह है की कश्मीरियों के बिना कश्मीर की कोई अहमियत नहीं ऐसे तो बर्बरता से दुनिया का कोई भी हिस्सा जीता जा सकता है. पर अगर कश्मीर और कश्मीरी दोनों चाहिए तो जवाब सैन्यीकरण में नहीं मिलेगा.

एक ही मार्ग खुला है जो वहां के लोगों के हक्कों की लड़ाई में साथ देने का है. तो धमकियों से परे हट कर कश्मीरी औरतों के प्रतिरोध में शामिल होकर उनके लिए भी देश को निर्भया जैसी एकजुटता दिखानी होगी.

WSS Press Note on Impact of NHRC & Action Taken by the Government of Chhattisgarh

Women Against Sexual Violence and State Repression
PRESS NOTE
2 February 2017

WSS applauds the “NHRC Effect”
Government of Chattisgarh takes action to restore rule of law in Bastar
IG Kalluri asked to proceed on long leave

WSS welcomes the actions taken by the Government of Chhattisgarh to restore its credibility and regain the confidence of the citizens of Bastar. In a series of decisive administrative actions yesterday, the state government announced the appointment of Sri P Sundararaj, IPS as DIG of the newly­created Dantewada Range. Bastar IG Sri SRP Kalluri has been asked to proceed on long leave.

These actions follow on the heels of the appearance of senior state government officials before the National Human Rights Commission on 30 January 2017. The NHRC had summoned these officials to answer for the apathy of the state government in responding to the egregious violations of human rights and vendetta against human rights defenders perpetrated by the police and police­ sponsored vigilante groups encouraged and supported by the police under Sri Kalluri. Continue reading

WSS Press Note on the Attack on Bela Bhatia

Women Against Sexual Violence and State Repression condemns the recent attack against Bela Bhatia, a researcher and activist, based in Bastar, Chhattisgarh. On the 23rd of January, 2017, a group of 30-odd men attacked Bela near her house. They barged into her house violently, and threatened to burn the building down if she did not leave immediately. The mob also attacked the owners of the building as well as their children, threatening them with dire consequences if Bela was not evicted immediately. Despite Bela’s assurances that she would leave, the mob continued to be belligerent, in the presence of the police, and even when the Sarpanch arrived.

In the meantime, concerned friends of Bela, who were informed by her of the attack and threat to her life, called SRP Kalluri, who is the Inspector General of Police, Bastar District, to enquire about her well-being. One person spoke to SRP Kalluri and asked him about Bela, and he lied to her that she had succumbed to her injuries in the hospital.

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Press Release on Emergency in Bastar by WSS & Citizens For Peace And Justice in Chhattisgarh

WSS and Citizens for Peace and Justice in Chhattisgarh had organized a press meet in Delhi on 12th January 2017 to highlight the emergency-like situation in Chhattisgarh and the brazen attacks on human rights defenders demanding accountability from the state and police department.

Prof Nandini Sundar, Advocate Shalini Gera, researcher and journalist Vineet Tewari, WSS member Rinchin and human rights lawyer Adv Vrinda Grover and Advocate Savithri (member of the Telengana Democratic Forum and wife of Advocate Balla Ravindranath, one of the seven members of a fact­finding team on their way to Bastar who were picked up on Christmas Day by the Chhattisgarh police) spoke on the occasion.

Read the press release here