Tag Archives: state repression

हिडमे मरकम की तत्काल रिहाई तथा बस्तर में आदिवासियों पर राज्य द्वारा किए जाने वाले अत्याचार को समाप्त किए जाने की अपील

प्रेस विज्ञप्ति

भारत के 20 से ज़्यादा राज्यों और दुनिया भर के 1,000 से ज़्यादा कार्यकर्ता, शिक्षाविद, सजग नागरिकों ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री को लिखा

हिडमे मरकम की तत्काल रिहाई तथा बस्तर में आदिवासियों पर राज्य द्वारा किए जाने वाले अत्याचार को समाप्त किए जाने की अपील

21 अप्रैल, 2021: एक आदिवासी मानवाधिकार रक्षक और पर्यावरण कार्यकर्ता हिडमे मरकम की मनमाने तरीक़े से गिरफ़्तारी के 40 दिनों बाद एक हज़ार से अधिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, दुनिया भर के सजग नागरिकों ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल को एक याचिका भेजी है जिसमें हिडमे मरकम को तुरंत रिहा करने तथा छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के ख़िलाफ़ दमन के चक्र को समाप्त करने के लिए सक्रिय क़दम उठाने का आह्वान किया है। उन्होंने यह भी अपील की कि हिडमे और अन्य आदिवासी कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ लगाए गए झूठे आरोप हटाए जाएँ और यौन और राज्य हिंसा के सभी मामलों में स्वतंत्र जाँच की जाए। [पूरा पत्र और हस्ताक्षरकर्ताओं की पूरी सूची संलग्न है]

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Free Hidme Markam: 1000+ activists, academics, concerned citizens write to Chief Minister, Chhattisgarh

1,000 + activists, academics, concerned citizens from 20+ states in India and across the globe write to Chief Minister Chhattisgarh

Call for immediate release of Hidme Markam and end state excess on adivasis in Bastar 

21 Apr, 2021: Deeply outraged by the arbitrary incarceration of Hidme Markam, an adivasi human rights defender and environmental activist, for over 40 days, more than a thousand activists, academics, concerned citizens from across the globe sent a petition to Mr. Bhupesh Baghel, the Chief Minister, Chhattisgarh calling upon him to immediate ensure the release of Hidme Markam and take pro-active steps to end the cycle of repression against adivasis in Chhattisgarh. They also appealed that false charges against Hidme and other adivasi activists be dropped and an independent inquiry be conducted into all instances of sexual and state violence.

[The full text of the letter and full list of signatories available at the end]  

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24 वर्षीय दलित कार्यकर्ता नोदीप कौर को कुण्डली औद्योगिक क्षेत्र से हरियाणा पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारी और हिरासत में उनके साथ हुई यौन हिंसा की WSS कड़े शब्दों में निंदा करती है।

हम मांग करते हैं कि मज़दूर अधिकार संगठन (एम. ए. एस.) के कार्यकर्ताओं नोदीप कौर और शिव कुमार को तुरंत रिहा किया जाए। हम मांग करते हैं कि हरियाणा पुलिस मजदूरों एवं किसानों को निशाना बनाना बंद करे।

12 जनवरी को कुण्डली औद्योगिक क्षेत्र में एक श्रमिक रैली का आयोजन होता है जिसमें बकाया मजदूरी की मांग करने वाले श्रमिकों पर हरियाणा पुलिस द्वारा गोलीबारी किया जाता है, पुलिस का दावा है कि आंदोलनकारी श्रमिक फैक्ट्री मालिकों से जबरन वसूली कर रहे थे। आयोजन में हुए अचानक गोलीबारी से चारो दिशा में भगदड़ होती है जिसमें एक 24 वर्षीय दलित कार्यकर्ता नोदीप कौर को पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया और उन्हें बेरहमी से पीटा जाता है। उन्हें पीट रहे सारे पुरुष पुलिस थे। उनमें एक भी महिला पुलिस कर्मी नहीं थी। पुलिस उनके गुप्तांगों को खास निशाना बना कर पीटती है और वहां से कुण्डली पुलिस स्टेशन तक लगभग घसीटते हुए ले जाती है।

कुण्डली थाना ले जाने के बाद उन्हें गिरफ्तार कर उनके खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की गई, एफआईआर 25/2021 और 26/2021; भारतीय दंड संहिता की धारा 148, 149, 186, 332, 352, 384, 379B और 307 के तहत एक और अन्य के तहत धारा 148, 149, 323, 452, 384 और 506 की उसपर एक सुनियोजित तरीके से दंगा भड़काने सहित कई आरोप लगाए गए हैं जिनमें सरकारी मुलाजिम को चोट पहुंचाना, मजमा लगा कर अपराधिक हमला, जबरन वसूली, धमकी और हत्या की कोशिश आदि है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि नोदीप कौर को हिरासत में लिए जाने के बाद भी पुलिस द्वारा उन्हें बेरहमी से पीटा जाता है। उनके शरीर पर जिस प्रकार की गंभीर चोटें हैं, उससे यह साबित है कि उनके साथ हिरासत में यौन हिंसा की गई है। उन तमाम जख्मों के बाद भी उन्हें बिना किसी चिकित्सीय उपचार या सहायता दिए करनाल जेल में बंद कर दिया जाता है। जेल में उन्हें केवल एक ही व्यक्ति – अपनी बहन से मिलने की अनुमति दी गई है पर ज़ख़्मों के चलते नोदीप उन से भी ठीक से बात नहीं कर पा रही हैं। हिरासत में दो हफ्ते से ज्यादा वक़्त बीत जाने के बाद 25 जनवरी को उन्हें वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से अदालत में पेश किया गया। पुलिस हिरासत में अपने पीटे जाने के बारे में अवगत कराने के बाद अदालत ने उनका मेडिकल परीक्षण कराने का आदेश दिया, मगर परिवार को मेडिकल जांच रिपोर्ट नहीं दी गई है। इस बीच मजदूर अधिकार संगठन (एम. ए. एस.) के एक और दलित कार्यकर्ता शिव कुमार को भी हरियाणा पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। एक तरफ किसान–मजदूर अधिकार के लिए संघर्षरत कार्यकर्ताओं पर पुलिस बर्बरता जारी है तो दूसरी तरफ सच्चाई सामने ला रहे मनदीप पुनिया जैसे स्वतंत्र पत्रकार को गिरफ्तार किया जा रहा है। वे दो महीने से ज्यादा के समय से किसान आन्दोलन को काफी नजदीक से कवर कर रहे थे, उन्होंने कुण्डली क्षेत्र में मजदूर-किसान एकता के मुद्दों को भी कवर किया था। अभी हाल ही में 29 जनवरी 2021 को अलग–अलग धरना स्थलों में किसानों पर हमला किया गया था, इस हमले के पीछे भाजपा–पुलिस के षडयंत्रकारी चेहरे को उसने सबके सामने लाने का काम किया है।

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WSS strongly condemns the arrest and custodial sexual violence perpetrated by the Haryana Police in Kundli Industrial Area against 24-year-old dalit worker Nodeep Kaur

Demand the immediate release of Nodeep Kaur and cessation of targeting of workers and peasants by the Haryana Police!

On January 12th 2021, the Haryana Police began firing at a workers’ rally in the Kundli Industrial Area. Firing at workers demanding unpaid wages, the police claimed that their demand amounted to extortion. Following the gunfire, when the congregated workers dispersed in all directions, a 24-year-old dalit worker, Nodeep Kaur, was caught by the police and brutally beaten. She was beaten by male police officers who targeted her genitals and then dragged her to the Kundli Police Station. She was then arrested and had two FIRs filed against her, FIR 25/2021 and 26/2021; one under sections 148, 149, 186, 332, 352, 384, 379B and 307 of the Indian Penal Code and the other under sections 148, 149, 323, 452, 384 and 506 with a wide range of charges including inciting a riot, causing hurt to a public servant, assault and criminal force, extortion, trespass, criminal intimidation and attempt to murder. Most shockingly, even after being taken into custody, Nodeep Kaur was mercilessly beaten by the police. She has sustained severe injuries on her body including her genitals amounting to sexual violence and torture in custody. She has been lodged in Karnal Jail, without adequate medical care or support, barely able to speak to her sister, one of the only persons she is allowed to meet. She has spent over two weeks in judicial custody. On January 25th, she was produced in court via video conference. The court ordered a medical examination over two weeks after she was beaten in custody. The family has not been provided the medical examination report. Meanwhile, another worker and Majdoor Adhikar Sanghatan (MAS) activist Shiv Kumar has also been arrested by the Haryana Police. This comes alongside the arrest of Mandeep Punia, a freelance journalist who had been extensively covering the Kisan Andolan for over two months, who covered issues of worker-peasant unity in the Kundli area and, most recently, had exposed the BJP-police nexus during the attack against the peasants at the border on January 29th 2021.

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Open Letter To Chief Justice, Andhra Pradesh High Court Regarding UAPA Charges On Mr. V. S. Krishna And Others

An Open Letter to

The Honourable Chief Justice,

Andhra Pradesh High Court

 4 December, 2020

We, as a group working towards achieving a safer and more just society for women, are writing this open letter to you in great dismay at some recent developments in Andhra Pradesh state.

As you are aware, the alleged gang-rape case of 11 adivasi women of the Kondh tribe by 13 men of AP Special Police personnel during a raid conducted in Vakapalli, has had a long legal history since August 2007, first in High Court of Andhra Pradesh and then in Supreme Court, and now in the SC/ST Special Court where it is in the final stages of hearing. After a decade-long chequered legal battle, the Supreme Court in 2017 ordered that the case be heard by an SC/ST Special Court. Whether the High Court or Supreme Court, the judiciary stood by the victims all these years and has helped to institute a special court for hearing the case.

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